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Friday, April 9, 2021

क्षणे नेत्री, क्षणे अभिनेत्री… वाह! जया ‘बच्चन’ जी मजा आ गया, सॉरी जया ‘भादुड़ी’

जया बच्चन

--- क्षणे नेत्री, क्षणे अभिनेत्री… वाह! जया ‘बच्चन’ जी मजा आ गया, सॉरी जया ‘भादुड़ी’ लेख आप ऑपइंडिया वेबसाइट पे पढ़ सकते हैं ---

चुनाव अकेला नहीं आता। अपने साथ मंच, प्रपंच, स्क्रीनशॉट, ह्वाट्सऐप चैट, ऑडियो, वीडियो, पिक्स, लीक्स, प्रचार, अधिकार, नमस्कार, आभार, स्ट्रैटेजी, ट्रैजेडी, नारे, वादे, इरादे, आरोप, प्रत्यारोप, चुनावी विचारक, सिलेब्रिटी प्रचारक… और प्रशांत किशोर लेकर आता है।

इसी संस्कृति के लिए सिलेब्रिटी प्रचारक जया बच्चन भी ममता बनर्जी के समर्थन में मुंबई से चलकर कोलकाता आईं। आती भी न कैसे? ममता बनर्जी ने देश भर के नेताओं से मिलकर लड़ने की अपील जो की थी।

जया जी ने आते ही प्रेस कॉन्फ्रेन्स किया। बोलीं: मैं आज जया बच्चन हूँ, पर कल जया भादुड़ी थी और मेरे पिता तरुण कुमार भी भादुड़ी ही थे। अर्थात्; न समझना कि मैं उत्तर प्रदेश या मुंबई से आई हूँ। मैं बंगाली हूँ। ऐसे में ममता बनर्जी के ‘यूपी, बिहार वाले बाहर से आकर बंगाल पर कब्जा करना चाहते हैं’ वाली बात के जवाब में मुझे बाहर वाला नहीं बताया जा सकता।

वे बताती हैं कि मेरे पार्टी के नेता ने ममता जी के प्रति उनके समर्थन की अभिव्यक्ति के लिए मुझे चुना। अखिलेश ने उन्हें भेज कर अच्छा किया। ख़ुद आते तो क्या पता ममता दीदी उन्हें भी यूपी से आया बाहर वाला बता बैठती। वे तो एक पार्टी के मालिक भी हैं। कहीं ये बात न फैल जाती कि उत्तर प्रदेश से बंगाल आए समाजवादी पार्टी के नेता बंगाल पर कब्जा करना चाहते हैं।

भला हो जया जी का जिन्होंने एक बंगाली के रूप में आकर अखिलेश यादव और ममता जी, दोनों को धर्मसंकट से बचा लिया!

प्रेस कॉन्फ्रेन्स में जया बच्चन चिंतित दिखीं। उन्होंने बताया वे यहाँ अभिनय करने नहीं आईं। अब यह बताने की क्या बात हुई? सबको पता है राजनीति करने आईं हैं। अब राजनीति में अभिनय हो जाए तो वो अलग बात है। आगे बताया कि लोकतंत्र खतरे में है इसलिए आवश्यक है कि उसकी रक्षा की जाए। अब इसमें कौन सी नई बात है? पिछले सात वर्षों में चुनावी दिनों में संभावित परिणामों की आड़ में अक्सर लोकतंत्र खतरे में चला जाता है। कहीं वोटिंग मशीन के नाम पर तो कहीं अंतर्मन की आवाज के नाम पर। जनता को समझ नहीं आता कि लोकतंत्र ख़तरे में है, इसलिए जया जी जैसी सिलेब्रिटी विचारक जनता को बताते हैं। ये इधर बताते रहते हैं और जनता उधर बार-बार अपने मूड से इनके लिए लोकतंत्र को खतरे में डालती रहती है।

जया जी समाजवादी पार्टी की सांसद हैं पर उन्हें अपनी पार्टी के नेताओं के बयान और आचरण से आज तक लोकतंत्र खतरे में जाता नहीं दिखा। बंगाल में चुनाव के पहले साढ़े तीन वर्षों से सैकड़ों राजनीतिक विरोधियों की हत्या के बावजूद खतरे में नहीं दिखा। अब उन कर्मों के संभावित परिणाम का समय आया तो लोकतंत्र खतरे में चला गया।

जया जी अपने साथ ढेर सारी सीख भी ले आई हैं। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने ऐसी ही एक सीख का पिटारा खोला और पत्रकारों से बोलीं; आप सब तो इसी बंगाल की मिट्टी के हैं। जो भी लिखें यहाँ के अनुसार (हमारे अनुसार पढ़ा जाए) लिखें। अपने बॉस के अनुसार न लिखें।

बताइए, लोकतंत्र की रक्षा के अपने इस महायज्ञ में वे पत्रकारों को भी शामिल कर लेना चाहती हैं; कि जो मंत्र पढ़कर हम स्वाहा बोल रहे हैं, वही मंत्र पढ़कर आप भी स्वाहा बोल दें तो बस मजा ही आ जाए। लोकतंत्र का महायज्ञ पूर्ण हो जाए। नेता खुलेआम पत्रकारों को बता रहे हैं कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है! अर्थात्; फ़िलहाल तो आप पर विश्वास नहीं है। हाँ, यदि हमारे अनुसार रिपोर्ट कर दें तो शायद यह विश्वास लौट आए।

संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक पर जया जी के अपने आचरण का एक पूरा इतिहास रहा है। और वे इस इतिहास में अक्सर एक नया अध्याय जोड़ देती हैं। कह सकते हैं उसे रेन्यू कर डालती हैं। जैसे वोट की अपील करते हुए तो नेत्री का आचरण करती हैं पर जब उसी अपील के समय कोई वोटर फोटो वग़ैरह लेना चाहे तो वे तुरंत अभिनेत्री बन जाती हैं। इसी क्रम में उन्होंने हावड़ा में सेल्फ़ीरत एक उत्साहित समर्थक को धक्का दे दिया। क्षण भर में नेत्री से अभिनेत्री बन लेना भी एक कला ही है। अब यह राजनीतिक कला है या कलात्मक राजनीति, यह शोध का विषय हो सकता है।

हो सकता है शोध के इस विषय पर शायद कोई उत्साही छात्र किसी दिन जेएनयू में पीएचडी कर ही ले। वैसे ममता बनर्जी के लिए जया बच्चन द्वारा गठरी बाँधकर लाया गया समर्थन दीदी की जीत के लिए काफी है या नहीं, इसकी जानकारी 2 मई को ही होगी।



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